(अरफे के नियाज़ की शरई हैसियत)

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  (अरफे के नियाज़ की शरई हैसियत)

शब ए बरात से एक दिन पहले 13 शाबानुल मुअज़्ज़म को  अरफे की नियाज़ दिलाई जाती है और उस नियाज़ में अलग-अलग जगहों के हिसाब से अलग-अलग रिवाज है कहीं तबरूक में सात तरिक़े के खाने पकाए जाते हैं और कहीं वह खाने पकाए जाते हैं जो मरहूम को पसंद थे और यह भी कहा जाता है कि अरफे के दिन वह अपने मुतअल्लिक़न से मिलने आती हैं अरफे से पहले रूहें भटकती रहती है अरफे की नियाज़ बाद मुतअल्लिक़न रूहें मरहूम की रूह को आलमें बरज़ख में ले जाती हैं वगैरा-वगैरा

 इन तमाम बातों की शरीयत मोतहरा में कोई अस्ल नहीं है और अरफे कि नियाज़ के हवाले से ये तमाम बातें लोगों की अपनी बनाई हुई है अलबत्ता ९ नवीं ज़िलहीज्जा के दिन को योमें अरफा कहा जाता है जिस दिन तमाम हुज्जाज ए किराम मैदाने अरफात में रहते हैं और हुज्जाज ए किराम के अलावा लोग उस दिन रोज़ा रखते हैं जिसके अहादीस में बहुत फज़िलत आई है

 13 शाबानुल मुअज़्ज़म वाला अरफा लोगों का बनाया हुआ है और उसकी नियाज़ की लवाज़िमात भी लोगों के बनाए हुए हैं इस सिलसिले में सही यह है कि अरफे की नियाज़ हो या और कोई नियाज़ तबर्रूक आसानी से मेयस्सर हो जाए काफी है और अगर तबर्रुक ना भी हो तो भी नियाज़ हो जाएगी

 रूहों का भटकना और अरफे के बाद रूहों का आलमे बरज़ख में ले जाना यह भी बे बुनियाद बातें हैं

 इमाम जलालुद्दीन सुयूती अपनी किताब शरह अल सुदूर में फरमाते हैं :इंतकाल के बाद मोमिनीन की रूहें रिमयाईल(رِمیائیل)नामी फरिश्ते के हवाले की जाती हैं वह मोमिनीन की रूहों के खाज़िन हैं जबकि कुफ्फार की रूहों पर मुकर्रर फरिश्ते का नाम दौमा(دَومہ)है (शरह अल सुदूर सफा २३७)

 और एक हदीस में नबी करीम सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम ने फरमाया मोमिनीन की अरवाह सब्ज़ परिंदों में होती हैं जन्नत में जहां चाहे सैर करती हैं अर्ज़ किया गया कि और काफिरों की रूहें ? इरशाद फरमाया सिजीन मे क़ैद होती है(اھوال القبور لابن رجب ، ص182)


 रही बात नियाज़ फातिहा और ऐसाले सवाब की तो ऐसाले सवाब कुरान व हदीस से साबित है वह हम कभी भी करा सकते हैं हम हर नमाज़ में अपने लिए और अपने वालिदैन के लिए और तमाम मोमिनीन के लिए दुआ करते हैं इस दुआ से भी मरहूमिन को फायदा पहुंचता है जैसा कि कुरान शरीफ में है( رَبَّنَا اغْفِرْ لِي وَلِوَالِدَيَّ وَلِلْمُؤْمِنِينَ يَوْمَ يَقُومُ الْحِسَابُ)(सूरह इब्राहिम आयत ४१)


 और हदीस शरीफ में है कि हज़रत ए सैयदना अनस रज़ि अल्लाहू तआला अंह ने अपनी बारगाह ए रिसालत में अर्ज़ किया हम अपने मुर्दों के लिए दुआ करते हैं और उनकी तरफ से सदक़ा और हज करते हैं क्या उन्हें इसका सवाब पहुंचता है ?सरकार ए मदीना सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इरशाद फरमाया(اِنَّهٗ لَيَصِلُ اِلَيۡهِمۡ وَيَفۡرَحُوۡنَ بِهٖ كَمَا يَفۡرَحُ اَحَدُكُمۡ بِالۡهَدِيَّةِ)

उन्हें इसका सवाब पहुंचता है और वह इस से ऐसे ही खुश होते हैं जैसे तुम में से कोई शख्स तोहफे से खुश होता है(उमदतुल क़ारी जिल्द ६ सफा ३०५)

 यह भी वाज़िह रहे कि ऐसाले सवाब के लिए यह शर्त नहीं कि जिसे ऐसाले सवाब किया जा रहा है की वह इंतकाल कर चुका हो बल्कि जिंदो को भी ऐसाले सवाब किया जा सकता है (शामी:६०५/१)

 अरफे के दिन नियाज़ फातिहा ऐसाले सवाब कर सकते हैं उसके साथ बाक़ी चीजें सही नहीं है मौला हम पर रहम फरमाए और अपना फज़लें खास फरमाए और हमें दीन सीखने और सिखाने की तौफीक अता फरमाए

 अज़ क़लम 
 मोहम्मद ज़फर नूरी अज़हरी 
 बानी व मो तमिम : (जामिआ अल हज्जाज़ गवालियार इंडिया)
13 शाबानुल मुअज़्ज़म 1441

हिंदी ट्रांसलेट
 मोहम्मद रिज़वानुल क़ादरी 
सेमरबारी दुदही कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)
13 शाबानुल मुअज़्ज़म 1442


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