(हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह)
यह खानदाने कुरैश के बहुत ही नामवर और मुअज़्ज़ज़ शख़्स हैं। फहर बिन मालिक पर उन का ख़ानदानी शजरा रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहे वासल्लम के ख़ानदान से मिल जाता है। यह भी अशरए मुबश्शेरा में से हैं। उन का असली नाम "आमिर" है। अबू उबैदा उन की कुन्नियत है और उन को बारगाहे रिसालत में अमीनुल उम्मत का लक़ब मिला है शुरू इस्लाम ही में हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ ने उन के सामने इस्लाम पेश किया तो आप फौरन ही इस्लाम क़बूल करके जाँ निसारी के लिए बारगाहे रिसालत में हाज़िर हो गए। पहले आप ने हबशा हिजरत की। फ़िर हबशा से हिजरत करके मदीना मुनव्वरा चले गए। जंगे बद्र आदि तमाम इस्लामी जंगों में इन्तहाई जाँबाज़ी के साथ कुफ़्फ़ार से मअरका आराई करते रहे। जंगे उहुद में दो कड़ियाँ हुज़ूरे अनवर के रूख़्सार (गाल) में चुभ गई थी। आप ने अपने दाँतों से पकड़ कर लोहे की उन कड़ियों को खींच कर निकाला। उसी में आप के अगले दो दाँत शहीद हो गए थे। बहुत ही शेरे दिल बहादुर, बलन्द क़ामत और बारोब चेहरे वाले पहलवान थे। 18 हिजरी में बमुक़ामे उरदुन ताऊन अमवास मे वफ़ात पा गए। हज़रत मआज़ बिन जबल ने नमाज़े जनाज़ा पढ़ाई और मक़ामे बीसान में दफनू हुए। बवक़्ते वफ़ात उम्र शरीफ अटठावन बरस थी।(अकमाल फि असमाइर्रिजाल स 608) (करामाते सहाबा हिंदी पेज 100/101)बे मिसाल मछली
आप तीन सौ मुजाहिदीने इस्लाम के लश्कर के कमान्डर बन कर "सैफुल बहर" में जिहाद के लिए तशरीफ ले गए। वहाँ फौज का राशन ख़त्म हो गया। यहाँ तक कि यह चौबीस चौबीस घंटे में एक एक खजूर बतौरे राशन के मुजाहिदीन को देने लगे। फिर वह खजूरें भी ख़तम हो गईं। अब भूके रहने के सिवा कोई चारा नहीं था। उस मौके पर आप की यह करामत ज़ाहिर हुई कि अचानक समन्द्र की तूफानी मौजों ने किनारे पर एक बहुत बड़ी मच्छली को फेंक दिया उस मच्छली को यह तीन सौ मुजाहिदीन की फौज अट्ठारा दिनों तक पेट भर कर खाते रहे और उस की चरबी को अपने जिसमों पर मलती रही। यहाँ तक कि सब लोग तन्दुरूस्त और खूब मोटे ताज़े हो गए फिर चलते वक़्त उस मच्छली का कुछ हिस्सा काट कर अपने साथ ले कर मदीना मुनव्वरा वापस आए और हुजूरे अक़्दस की खिदमते अक़्दस में भी इस मच्छली का एक टुकड़ा पेश किया जिस को आप ने खाया और इरशाद फरमाया कि उस मच्छली को अल्लाह तआला ने तुम्हारा रिज़्क बना कर भेज दिया। यह मच्छली कितनी बड़ी थी लोगों को उस का अन्दाज़ा बताने के लिए अमीरे लश्कर हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह ने हुक्म दिया कि उस मच्छली की दो पिस्लियों को ज़मीन में गाड़दें। चुनान्चे दोनों पिस्लियाँ ज़मीन में गाड़ दी गई तो इतनी बड़ी मेहराब बन गई कि उस के नीचे कजावा बंधा हुआ ऊँट गुज़र गया।(बुख़ारी शरीफ जि 2, स 626, बाब ग़ज़वए सैफुल बहर)
तबसेराःऐसे वक़्त में जब कि लश्कर में ख़ुराक का सारा सामान ख़त्म हो चुका था और लश्कर के सिपाहियों के लिए भूके रहने के सिवा कोई चारा ही नहीं था। विल्कुल अचानक बेग़ैर किसी मेहनत व मुशक़्कृत के उस मच्छली को तीन सौ भूके सिपाहियों ने उस मच्छली को काट काट कर अट्ठारा दिनों तक ख़ूब ख़ूब शिकम सेर होकर खाया। यह एक दूसरी करामत है। क्योंकि इतनी बड़ी बच्छली बहुत ही कम है कि इतना बड़ा लश्कर उस को इतने दिनों तक खाता रहे और फिर उस के टुकड़ों को काट काट कर ऊँटों पर लाद कर मदीना मुनव्वरा तक ले जाए मगर फिर भी मच्छली ख़त्म नहीं हुई बल्कि उस का कुछ हिस्सा लोग छोड़ कर चले गए। इतनी बड़ी मच्छली का वजूद दुनिया में बहुत ही कम है। फिर मच्छली एक ऐसी चीज़ है कि मरने के बाद दो चार दिनों में सड़ गल कर और पानी बन कर वह जाती है मगर आदत के ख़िलाफ़ महीनों तक यह मरी हुई मच्छली ज़मीन पर धूप में पड़ी रही। फिर भी बिल्कुल ताज़ा रही। न उस में बदबू पैदा हुई न उस का मज़ा बदला। यह तीसरी करामत है।
ग़रज़ इस अजीब व ग़रीब मच्छली का मिल जाना उस एक करामत के बीच में चन्द करामतें जाहिर हुईं जो बिला शुब्हा अमीरे लश्कर हज़रत अबू उबैदा बिन जर्राह जन्नती सहाबो की बहुत ही अज़ीम और नादिरूल वजूद करामतें हैं। वल्लाहु तआला आलम (करामाते सहाबा हिंदी पेज 101/102)
पेश करदा
मोहम्मद सदरे आलम निज़ामी मिस्बाही
ख़तीब व इमाम गुर्जी अली बेग मस्जिद
नया पुरवा फैज़ाबाद अयोध्या