(बगैर अज़ाफत तलाक़ होगी)
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह व बरकातुहुसवाल:किया फरमाते हैं उलमाए दीन व मुफ्तियाने किराम इस मसअले में कि ज़ैद किसी बात पर ससुर ले लड़ पड़ा और इसी बीच अपनी बीवी को तीन बार "तलाक तलाक तलाक" बोल दिया अब ज़ैद का कहना है कि "जब मैने तलाक तलाक तलाक बोला तो मेरी बीवी मौजूद न थी और न मेरी नियत तलाक की थी और न देता हूँ कहा" अब पूछना यह है कि किया ऐसी सूरत में ज़ैद की बीवी पर तलाक वाक़े हो गई या नहीं शरीयत के मुताबिक इस का किया हुक्म है ?जवाब इनायत फरमाएं !
साइल : हाफिज अब्दुर्रहमान अशरफी दाहूद (गुजरात)
व अलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु
जवाब :सब से पहले मसअला वाजेह रहे कि तलाक वाक़े होने के लिये बीवी की तरफ तलाक़ की इजाफत जरूरी है चाहे इजाफत लफ्जी हो ( जैसे मैने अपनी बीवी को तलाक़ दिया ) या मानवी अगर तलाक़ में बीवी की तरफ इजाफत न हो तो तलाक़ वाक़े नहीं होती जब तक कि मुतालबए तलाक़ या मुजाकरा ए तलाक़ न हो, लिहाजा सच में सवाल करने वाला अगर वाकई शोहर (जैद) ने झगड़े के दौरान अपनी बीवी की गैर मौजूदगी में उस को तीन मर्तबा " तलाक़ तलाक़ तलाक़ " बोल दिया था, ( जैसा कि सवाल में जिक्र है के उस की बीवी वहां मौजूद नहीं थी ) अगर मजकूरा अल्फाज से उस की नियत अपनी बीवी को तलाक़ देने की न थी तो इस सूरत में उस से क़सम ली जाएगी अगर वह क़सम खा ले के इन अल्फाज से मेरी नियत तलाक़ की नहीं थी तो हुक्म होगा कि उस की बीवी पर तलाक़ वाक़े न हुई, और अगर वाकई में तलाक़ की नियत थी और झुटी क़सम खाली तो अब वबाल (अजाब) उस पर है। और अगर दिल में बीवी की तरफ तलाक़ की एजाफ़त थी तो फ़ौरन उस की बीवी हुरमते मुग़ल्लिजा से शौहर पर हमेशा के लिये हराम हो गई क्योंकि सिर्फ लफ्ज़ तलाक़ उन अल्फाज में से है जिस में बीवी की तरफ एजाफ़त का पाया जाना जरूरी है। इस लिये अगर सराहतन एजाफ़त वाले अल्फाज इस्तेमाल किये जाएं या दिल नियत करते हुए बोले जाएं तो ही तलाक़ वाक़े होगी वरना नहीं ।जैसा कि फ़तावा आलमगीरी में है
لايَقَعُ فِي جِنْسِ الْإِضَافَةِ إذَا لَمْ يَنْوِ لِعَدَمِ الْإِضَافَةِ إلَيْهَا
यानी : एजाफ़त वाले सूरतों में जब नियत न हो तो बीवी की तरफ एजाफ़त न होने पर तलाक़ न होगी।इसी में है:
" سَكْرَانُ هَرَبَتْ مِنْهُ امْرَأَتُهُ فَتَبِعَهَا وَلَمْ يَظْفَرْ بِهَا فَقَالَ بِالْفَارِسِيَّةِ بَسّه طَلَاق إنْ قَالَ عَنَيْت امْرَأَتِي يَقَعُ وَإِنْ لَمْ يَقُلْ شَيْئًا لَا يَقَعُ"
यानी : एक नशा वाले से उस की बीवी भाग गई, वह पीछे भागा और कामयाब न होने पर उसने कहा: तीन तलाक़ के साथ, तो अगर वह शौहर कहे के मैने अपनी बीवी की नियत से तलाक़ के अल्फाज कहे, तो तलाक़ वाक़े होगी, और अगर उसने कुछ न कहा तो तलाक़ न होगी।( फ़तावा आलमगीरी चेप्टर नo 7 पार्ट 1 पेज नo 382 )
फ़तावा रजविया में आला हजरत अलैहिर रहमा से जब ऐसे शख्स के बारे में सवाल हुआ जिसने अपनी बीवी का नाम लिये बगैर उसकी गैर मौजूदगी में " एक तलाक़ दो तलाक़ तीन तलाक़ " के अल्फाज इस्तेमाल किये लेकिन "देता हूं या नहीं देता हूं" कुछ न कहा तो आप अलैहिर्रहमा ने इसका तफसील से जवाब देते हुए जो फरमाया उसका खुलासा यह है कि हुक्म दो तरह का होता है एक दयानतन और दूसरा क़जाअन
दयानतन हुक्म यह है कि बंदे और अल्लाह पाक के दरमियान का मामला है यहां किसी दूसरे का दखल नहीं, बंदा जाने और खुदा जाने और सवाल में बयान की गई सूरत में बीवी की तरफ तलाक़ की एजाफ़त का इरादा न किया हो तो कतअन तलाक़ न हुई, क्योंकि तलाक़ का वक़ू वाक़े करने के बगैर नहीं होता और तलाक़ का वाक़े करना उस वक्त तक नहीं हो सकता जब तक तलाक़ का ताल्लुक़ बीवी से न किया जाए और यह एजाफत के बगैर मुमकिन नहीं इस लिये एजाफत जरूरी है चाहे नियत में हो, तो तलाक़ जब एजाफत लफ्जी या क़लबी से खाली हो तो तलाक़ का ताल्लुक़ पैदा न होगा क्योंकि ताल्लुक़ बगैर मुतअल्लिक के नहीं हो सकता, इस लिये ईका न होगा तो वकूअ भी न होगा इतनी बात वाजेह है जिस में कोई शक व शुबह नहीं हो सकता, और क़ज़ाअन भी तलाक़ को वाक़े करने के हुक्म के लिये एजाफत का तहक्कुक ( असलियत सच्चाई ) जरूरी है ( किताब फ़तावा रजविया पार्ट 12 पेज 336 रजा फाउंडेशन )
फ़क़ीह आजम हिंद हजरत अल्लामा मुफ्ती अमजद अली आज़मी अलैहिर्रहमा बहारे शरीयत में लिखते हैं कि "तलाक़ में एजाफ़त जरूर होनी चाहिये बगैर एजाफ़त तलाक़ वाक़े न होगी चाहे हाजिर का सेगा से बयान करे - जैसे तुझे तलाक़ है, या इशारा के साथ - जैसे इसे या उसे या नाम ले कर कहे कि फलानी को तलाक़ है या उसके जिस्म व बदन या रूह की तरफ निसबत करे जो सब के क़ाइम मक़ाम तसव्वुर किया जाता हो "( बहारे शरीयत पार्ट 1 पेज 11 फरीद बुक डिपो नई दिल्ली )
ऊपर बयान किये गए हवाला जात की रोशनी में मालुम हुआ कि बगैर एजाफ़त के तलाक़ वाक़े न होगी चाहे एजाफ़त लफ्जी हो या मानवी जब तक कि मुतालबए तलाक़ या मुजाकराए तलाक़ न हो
नोट:- जैद से क़सम ली जाए अगर क़सम खा ले तो उनका यानी शौहर और बीवी का आपस में मिल कर रहने में कोई हर्ज न होगा और अगर क़सम न खाए या टाल मटोल करे या बातें बनाए तो उसे मजबूर किया जाए कि बीवी से दूर रहे जब तक हलाला हो इद्दत न गुजर जाए या हमेशा के लिये अलग हो जाएं और अगर ऐसा न करे तो मोहल्ला के मुसलमानों पर लाज़िम व जरूरी है कि समाजी बाइकाट कर दें।वल्लाहु तआला आलम व रसूलहु आलम
अज़ कलम
सैयद मोहम्मद नज़ीरुल हाशमी सोहरवर्दी
शाही दारुल क़ज़ा व आस्तानए आलिया गोसिया सोहरवर्दी दाहूद शरीफ अलहिंद
बतारीख 7 नवंबर 2024 ई
मुताबिक 4 जमादिल अव्वल 1446 हिजरी बरोज़ चहार शम्बा (बुध)
हिंदी अनुवादक
मुजस्सम हुसैन गोड्डा ( झारखंड )
मुक़ीम: गाजीपुर (उत्तर प्रदेश)
15 जमादिल अव्वल 1446 हिजरी 18 नवंबर 2024 ई बरोज सोमवार
मिन जानिब
मसाइले शरइया ग्रुप